सर्वोपरि ध्येय
साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा

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‘‘लेखिका तेरापंथ धर्म संघ की अष्टम् साध्वी प्रमुखा होने के साथ-साथ उच्च कोटि की साहित्यकार हैं जिन्होंने प्रचुर मात्रा में साहित्य सृजन किया है। उनकी साहित्यिक प्रतिभा गद्य, पद्य, काव्य, दर्शन, जीवन वृत्त, यात्रा वृत्त सभी दिशाओं में प्रवाहित होती है। आचार्य तुलसी की अधिकांश साहित्यिक कृतियों में लेखिका का संपादन कौशल मुखरित हुआ है। देश के मूर्धन्य विचारक और साहित्यकार भी इनके सृजन कौशल के प्रशंसक रहे हैं।’’

सर्वोपरि ध्येय
साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा

धर्म के दो रूप है- निश्चय और व्यवहार। दूसरे शब्दों में आचरण और उपासना। आचरण का सम्बन्ध आत्मा की पवित्रता के साथ है। उपासन की पृष्ठभूमि में काम करने वाले तत्त्व हैं- व्यक्ति की अपनी रूचि, सुविधा और पारम्परिक संस्कार। आचरण की उदात्रता त्रैकालिक सच्चाई है। उपासना एक सापेक्ष तत्व है, जिसमें देश-काल के अनुसार परिवर्तन होता रहता है। आचरण जीवन से जुड़ा हुआ है, इसलिए वह गांव, शहर, अरण्य आदि की सीमा में आबद्ध नहीं है। उपासना के लिए उपयुक्त स्थान, समय आदि की अपेक्षा रहती है।
एक व्यक्ति मन्दिर में जाकर पूजा-पाठ करता है, दूसरा मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ता है। कोई सगुण भगवान की पूजा करता है, कोई निर्गुण ईश्वर में विश्वास में रकता है। कोई गुरुद्वारा में जाकर ग्रन्थ साहब का पाठ करता है, कोई शिवलिंग की पूजा करता है, कोई सत्संग में जाता है, कोई साधु-सन्तों से तत्त्व बोध पाने का प्रयास करता है। ये सब उपासना के प्रकार है। इसके और भी अनेक रूप हो सकते हैं। उन सबका समावेश व्यवहार धर्म में।
आचरण की कोई निश्चित विधि नहीं है वह जीवन-मूल्यों का प्रतीक है। समता, सहनशीलता, सरलता, कोमलता, सत्यनिष्ठा, संयम, सन्तोष, अनासक्ति, ईमानदारी, करूणा, मैत्री आदि तत्त्वों में धर्म का निश्चयात्मक स्वरूप प्रतिबिम्बित रहता है।
साधना की तलहरी पर खड़ा व्यक्ति निश्चय धर्म की आराधना के सहारे कुछ ही क्षणों में शिखर तक पहुंच जाता है। इस सन्दर्भ में मरूदेवा माता एक जीवन्त निदर्शन है। उन्होंने व गृहत्याग किया और न ‘सावज्ज जोगं पच्चक्खामि’ यह संकल्प स्वीकार किया। न पदयात्रा की, न तपः साधना से शरीर को तपाया। न ध्यान-स्वाध्याय का आलम्बन लिया, न सेवा का व्रत लिया। शरीर को किसी भी प्रकार का कष्ट लिए बिना हाथी के होदे पर केवल ज्ञान की उपलब्धि निश्चय धर्म की आराधना का फलित है। इस उपलब्धि के तत्काल बाद सिद्धि का वरण कर मरूदेवा माता ने भगवान ऋषभ के समवसरण में उपस्थित जनता को विस्मय के सागर में उतार दिया।
सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति का एक मात्र साधन है निश्चय धर्म। पर उस ऊंचाई तक पहुंचने के लिए बैसाखी के रूप में व्यवहार धर्म का आलम्बन भी स्वीकार्य हो सकता है। प्रस्तुत आलम्बन सुविधाजनक होने के साथ मन की आश्वस्ति का भी निमित्त बनता है। किन्तु यहीं पर अटकने वाला व्यक्ति अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सकता। इस दृष्टि से उपासना के साथ आचार धर्म की साधना जीवन का सर्वोपरि ध्येय बने।
साध्वी प्रमुखाश्री कनकप्रभाजी के अमृत महोत्सव पर अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल द्वारा प्रदत आलेख।

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